सिटी ऑफ लेक्स’ से ‘सिटी ऑफ फ्यूचर’ तक का रोडमैप: भोपाल इंटरनेशनल सेंटर ने नागरिक समागम में रखा मेट्रोपॉलिटन विजन 2047
गणतंत्र दिवस पर आयोजित नागरिक समागम में शहरी नियोजन, पर्यावरण, परिवहन और नागरिक भागीदारी पर मंथन, विशेषज्ञों ने मौजूदा विकास मॉडल पर उठाए गंभीर सवाल

विवेक झा, भोपाल। भोपाल इंटरनेशनल सेंटर द्वारा अपनी तृतीय वर्षगांठ के अवसर पर गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित “नागरिक समागम” में भोपाल के भविष्य को लेकर “नागरिक मिशन : मेट्रोपॉलिटन भोपाल 2047” का दृष्टिपत्र प्रस्तुत किया गया। स्थानीय क्लब में आयोजित इस कार्यक्रम में शहरी नियोजन, पर्यावरण, परिवहन, नागरिक सहभागिता और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर गहन विमर्श हुआ।
संस्था के संस्थापक शशिधर कपूर ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि गणतंत्र दिवस केवल एक संवैधानिक उत्सव नहीं, बल्कि नागरिकों और संस्थानों को सशक्त करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि भोपाल इंटरनेशनल सेंटर लोक पैरोकारिता और नागरिक संवाद के माध्यम से इन दोनों को मजबूत करने की दिशा में सतत भूमिका निभा रहा है।

तीन वर्षों के संवाद की झलक
स्वागत वक्तव्य में सह-संस्थापक प्रीति त्रिपाठी ने एक वीडियो प्रस्तुति के माध्यम से बीते तीन वर्षों में नागरिक मुद्दों पर किए गए संवादों और पहलों को रेखांकित किया। कार्यक्रम का संचालन पर्यावरणविद् डॉ. प्रदीप नंदी ने किया, जिन्होंने “नागरिक मिशन : मेट्रोपॉलिटन भोपाल 2047” की थीम को विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने स्मरण कराया कि भोपाल के लिए मिशन आधारित दृष्टिकोण की अवधारणा सबसे पहले स्व. महेश बुच ने वर्ष 2010 में रखी थी।
समावेशी नियोजन पर सवाल
स्वतंत्र नगर प्रबंधन विशेषज्ञ डॉ. एच. एम. मिश्रा ने कहा कि वर्तमान में शहरी विकास की प्रक्रिया समावेशी नहीं है और अत्यधिक जोर केवल अधोसंरचना पर दिया जा रहा है। उन्होंने सार्वजनिक डाटा की अस्पष्टता पर चिंता जताते हुए इसे अधिक पारदर्शी और सुलभ बनाने की आवश्यकता बताई।
ग्राम एवं नगर नियोजन विशेषज्ञ सुश्री वर्षा नवलेकर ने कहा कि भोपाल मेट्रोपॉलिटन रीजन में शामिल 5-6 जिलों की भौगोलिक और सामाजिक विशेषताओं को ध्यान में रखकर अलग-अलग नियोजन नियम बनाए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि मौजूदा योजना केवल भूगोल तक सीमित है, जबकि ढांचागत और सामाजिक पहलुओं का समावेश जरूरी है।

सेवा आधारित शहर है भोपाल
नगर नियोजक डॉ. विनय श्रीवास्तव ने कहा कि शहर ही देश के विकास इंजन होते हैं, लेकिन भोपाल को एक औद्योगिक नगर की बजाय सेवा सुविधा प्रदायी शहर के रूप में समझने की आवश्यकता है। वैश्विक शहरी अराजकता के संदर्भ में भोपाल को अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी।
‘सिटी ऑफ लेक्स’ से ‘सिटी ऑफ गटर्स’ तक?
ख्यात पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष पांडे ने तीखे शब्दों में कहा कि भोपाल धीरे-धीरे “सिटी ऑफ लेक्स” से “सिटी ऑफ गटर्स” बनता जा रहा है। बड़े तालाब को छोड़कर अधिकांश तालाब गंभीर रूप से प्रदूषित हो चुके हैं और बड़ा तालाब भी खतरे की कगार पर है। उन्होंने “ए ग्रेड पानी” के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसकी स्वतंत्र पुष्टि आसानी से की जा सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कई तालाबों को बिना एसटीपी प्लांट्स के भी काफी हद तक पुनर्जीवित किया जा सकता है। डॉ. पांडे के अनुसार भोपाल का भूजल भी अब व्यापक रूप से प्रदूषित हो चुका है।

भूदृश्य आधारित नियोजन पर जोर
वरिष्ठ लैंडस्केप विशेषज्ञ डॉ. सविता राजे ने कहा कि भोपाल की पहचान उसके भूदृश्य से है, इसलिए संपूर्ण नियोजन इसी के इर्द-गिर्द होना चाहिए। उन्होंने भूमिगत जल नेटवर्क, पहाड़ियों, तालाबों और उनकी ढलानों के संरक्षण पर विशेष बल दिया।
स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के सौरभ पोपली ने कहा कि राजनीतिक अर्थव्यवस्था के कारण बड़े बदलाव चुनौतीपूर्ण होते हैं। उन्होंने पुनर्जीवी अर्थव्यवस्था और टिकाऊ विकास की बात करते हुए केंद्रीय परिवहन नीति 2014 के पालन न होने पर चिंता जताई, जिसके कारण भोपाल लगभग फुटपाथविहीन शहर बनता जा रहा है।
युवाओं की दृष्टि और समाधान
माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के छात्रों अंकित आनंद और अनुष्का सिंह ने भोपाल के परिवहन पर प्रस्तुति दी। उन्होंने बिशनखेड़ी एजुकेशनल एरिया में सार्वजनिक परिवहन की आवश्यकता और मुख्य सड़कों से अतिक्रमण हटाने पर जोर दिया। उन्होंने विश्वविद्यालय की पत्रिका “विकल्प” का इसी विषय पर केंद्रित विशेष अंक भी जारी किया।
भोपाल के लिए अपरिवर्तनीय मूल सिद्धांत
अनंतिम टिप्पणी में शशिधर कपूर ने कहा कि कुछ विषयों पर व्यापक सहमति उभरकर आई है, जिन पर किसी भी स्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता—जैसे पहाड़ियों और तालाबों का संरक्षण, जल और वायु की शुद्धता तथा शासन प्रक्रिया में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी।
कार्यक्रम के समापन पर प्रीति त्रिपाठी ने घोषणा की कि “नागरिक मेट्रोपॉलिटन विजन भोपाल 2047” को आगामी 1 जून (भोपाल दिवस) के अवसर पर प्रिंट, विजुअल और डिजिटल प्रारूप में सार्वजनिक किया जाएगा।





