संघर्ष, स्वर और सृजन का संगम बना ‘सरोकार’ की शाम

विभारानी, डॉ. वीणा और नन्हीं पीतांबरा ने साझा किए जीवन अनुभव, लैंगिक समानता और आत्मसम्मान का दिया संदेश

भोपाल। राजधानी के गांधी भवन स्थित एकता परिषद सभागार में शुक्रवार को सामाजिक संस्था सरोकार द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘स्वर, संघर्ष और सृजन’ भावनात्मक गहराई और विचारोत्तेजक संवादों के साथ संपन्न हुआ। लैंगिक समानता, मानवीय मूल्यों और जीवन संघर्ष पर केंद्रित इस विशेष विमर्श में साहित्य, सिनेमा, अध्यात्म और सामाजिक चेतना का अनूठा संगम देखने को मिला।

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता प्रख्यात अभिनेत्री एवं लेखिका विभारानी ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि “कलाकार का सृजन उसके जीवन संघर्षों की कोख से जन्म लेता है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था से जूझते हुए जीवन में कई पथरीली राहें आती हैं, सुख-दुख-दर्द का सफर तय करना पड़ता है, लेकिन थमना नहीं चाहिए। मेरी युवापीढ़ी से अपील है—जीवन को पूरे दम-खम से जिएं।”

उन्होंने अपने पारिवारिक जीवन, रंगमंच और सिनेमा के सफर को साझा करते हुए बताया कि किस तरह एक स्त्री के रूप में उन्होंने अपनी पहचान गढ़ी और समाज की कुरीतियों व कुपरंपराओं का सामना करते हुए पितृसत्तात्मक सोच से संघर्ष किया। विभारानी ने यह भी रेखांकित किया कि आत्मविश्वास और सतत प्रयास ही किसी भी महिला को आत्मनिर्भर बनाते हैं।

“बेटियां जीवन की रक्षा करते हुए सम्मान से जिएं” – डॉ. वीणा

कार्यक्रम में वक्ता डॉ. वीणा ने कहा कि बेटियों को केवल पढ़ाया ही नहीं, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला भी सिखानी होगी। “बेटियां जीवन की रक्षा करते हुए सम्मान के साथ जिएं—यही असली सशक्तिकरण है,” उन्होंने जोर देकर कहा। डॉ. वीणा ने परिवार और समाज दोनों स्तरों पर संवेदनशीलता बढ़ाने की आवश्यकता बताई।

नन्हीं पीतांबरा की मासूम मगर सशक्त आवाज

कार्यक्रम की खास आकर्षण बनीं नन्हीं पीतांबरा, जिन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा—“मैं खूब पढ़ती हूं, फिर लिखती हूं।” उनकी सादगी भरी बातों ने श्रोताओं को भावुक भी किया और प्रेरित भी।

आत्मीय संवाद और साहित्यिक वातावरण

संस्था की सचिव कुमुद सिंह तथा प्रज्ञा शर्मा ने विभारानी से उनके जीवन के अनछुए पहलुओं पर आत्मीय संवाद किया। मंच से उठे सवालों और जवाबों ने कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। उपस्थित श्रोताओं ने भी अपने अनुभव साझा किए और महिलाओं के अधिकार, रचनात्मकता तथा सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा हुई।

कुल मिलाकर, ‘सरोकार’ की यह शाम केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संघर्ष से सृजन तक की यात्रा का जीवंत दस्तावेज बनी—जहां अनुभवों की रोशनी में नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया गया और यह संदेश दिया गया कि बदलाव की शुरुआत आत्मविश्वास और संवेदना से होती है।

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