2029 तक Gen Z बनेगी भारत की सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी, चुनावी एजेंडा तय करने में बढ़ेगी ताकत

नई दिल्ली

आज तक भारतीय चुनावों में जाति, धर्म, क्षेत्र, ग्रामीण-शहरी विभाजन और आर्थिक स्थिति जैसे समीकरण सबसे ज्यादा चर्चा में रहते रहे हैं. लेकिन आने वाले चुनावों में इन पारंपरिक समीकरणों के साथ एक नया और बेहद प्रभावशाली फैक्टर जुड़ने वाला है. वह है भारत का डिजिटल, शिक्षित और मुखर युवा वर्ग. इस युवा वर्ग के एक रूप की एक झलक 'जेन जी' के जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन में पूरी दुनिया ने देखी।  

दरअसल, भारत की राजनीति अगले कुछ वर्षों में एक ऐसे बदलाव की ओर बढ़ रही है, जो शायद पिछले कई दशकों में सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय परिवर्तन होगा. 2029 के लोकसभा चुनाव तक देश में पहली बार 'जेन जी' यानी 18 से 32 वर्ष आयु वर्ग की आबादी सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी बन जाएगी। 

बीते दिनों, नीट परीक्षा से जुड़ी अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों को लेकर देशभर में छात्रों का गुस्सा देखने को मिला. देखते ही देखते यह गुस्सा शिक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता, भर्ती प्रणाली, जवाबदेही और युवाओं के भविष्य जैसे व्यापक मुद्दों तक पहुंच गया. इसे सोशल मीडिया ने गति दी. लाखों छात्रों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी आवाजें उठाईं और देखते ही देखते यह राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन गया और इसने आंदोलन का स्वरूप ले लिया और अंततः देश के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। 

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि देश के युवा शिक्षा समेत सरकारी नीतियों, रोजगार, आर्थिक अवसरों और शासन व्यवस्था पर भी अपनी मजबूत राय रखते हैं. यह 'जेन जी' पीढ़ी 2029 लोकसभा चुनावों तक देश में सबसे बड़ा वोटबैंक बनने की ओर तेजी से बढ़ रही है। 

2029 तक कितनी बड़ी होगी 'जेन जी'?
जनसांख्यिकी अनुमानों के मुताबिक भारत में 2029 तक 'जेन जी' की आबादी करीब 38 करोड़ होगी. इनमें 'जेन जी' पुरुषों की संख्या करीब 19.9 करोड़, तो महिलाएं लगभग 18.1 करोड़ होंगी। 

उस समय अगर अनुमानित मिलेनियल्स की संख्या से तुलना करें, तो देश में तब मिलेनियल्स की संख्या लगभग 35.7 करोड़ रहने का अनुमान है। 

यानी ये वो पहला मौका होगा जब पहली बार भारत की सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी 'जेन जी' होगी। 

इसका चुनावी महत्व क्या है?
'जेन जी' केवल संख्या में बड़ी नहीं होगी बल्कि यह समाज के सबसे सक्रिय वर्ग का प्रतिनिधित्व करेगी। 

उस दौरान करोड़ों की संख्या में वो 'जेन जी' पहली बार वोट डालने वाले युवा होंगे. इसमें कॉलेज, यूनिवर्सिटी और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र शामिल होंगे. तो नौकरी की तलाश में बेरोजगार युवा भी होंगे. वहीं ऐसे युवा भी होंगे जो अपना स्टार्टअप शुरू कर रहे होंगे. साथ ही इनमें अपना करियर स्टार्ट कर चुके और परिवार बसा रहे युवा भी शामिल होंगे। 

किन मुद्दों पर केंद्रित होगी राजनीति?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि 2029 तक चुनावी बहस का बड़ा हिस्सा कई विषयों पर आधारित हो सकता है. इनमें शिक्षा, रोजगार, महंगाई, घर, स्टार्टअप्स, क्लाइमेट चेंज और शासन-प्रशासन शामिल होगा। 

रोजगारः भारत हर साल लाखों युवाओं को रोजगार बाजार में प्रवेश करते देख रहा है. क्वालिटी जॉब्स, निजी निवेश और स्किल डेवलपमेंट सबसे बड़े चुनावी मुद्दों में शामिल हो सकते हैं। 

शिक्षाः पेपर लीक, परीक्षा के आयोजनों में सुधार, डिजिटल शिक्षा, विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता और रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर युवाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन चुके हैं। 

महंगाईः शुरुआती करियर वाले युवाओं के लिए घर खरीदना, किराया, स्वास्थ्य, परिवहन और जीवन-यापन की लागत बड़ा मुद्दा बन सकती है। 

घरः बड़े शहरों में प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतें और किराया युवा मतदाताओं को सीधे प्रभावित करेंगे। 

स्टार्टअप और AI: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और फ्यूचर जॉब्स भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकती हैं। 

क्लाइमेट चेंजः 'जेन जी' पर्यावरण और क्लीन एनर्जी जैसे मुद्दों पर पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक ऊर्जा और सतत विकास जैसे मुद्दों पर पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक प्रतिक्रिया देने वाली पीढ़ी मानी जाती है। 

क्या युवा वोटरों की संख्या भी बढ़ रही है?
दिलचस्प बात यह है कि संख्या बढ़ने के बावजूद कुल मतदाताओं में युवाओं का प्रतिशत लगातार घट रहा है। 

18-29 वर्ष आयु वर्ग की हिस्सेदारी:

1988: 38.3%
2024: 30.1%
2029 (अनुमानित): 27.8%

यानी 2029 तक लगभग हर चार मतदाताओं में एक ही युवा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत की आबादी धीरे-धीरे बुजुर्ग होती जा रही है। 

फिर 'जेन जी' इतनी प्रभावशाली क्यों?
राजनीतिक प्रभाव केवल संख्या से तय नहीं की जाती. 'जेन जी' की सबसे बड़ी ताकत उसकी डिजिटल पहुंच है। 

यह वर्ग मोबाइल इंटरनेट से जुड़ा है. सोशल मीडिया पर सक्रिय है. जानकारी तेजी से साझा करता है. ऑनलाइन अभियान चलाने में पहले की पीढ़ियों से कहीं अधिक सक्षम है. हाल के आंदोलन ने साबित किया कि यह पीढ़ी सरकार से जवाब मांग सकती है. इसमें ये ताकत है कि कुछ ही घंटों में किसी स्थानीय मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दे। 

यही कारण है कि राजनीतिक दल अब इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स और पिन्स्टर जैसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पहले से कहीं अधिक सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। 

राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती
2029 तक राजनीतिक दलों को अपने चुनावी घोषणापत्र में केवल वादों को एलान करना ही समुचित नहीं होगा. उन्हें यह भी बताना होगा कि जो वादे वो कर रहे हैं, उसे कैसे और कब तक पूरा करेंगे। 

राजनीतिक दलों को बताना होगा कि रोजगार कैसे बढ़ेगा? परीक्षाएं पारदर्शी कैसे होंगी? AI से रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव का समाधान क्या होगा? युवाओं को सस्ते घर कैसे मिलेंगे? स्टार्टअप को कैसे बढ़ावा मिलेगा? हायर एजुकेशन की क्वालिटी में सुधार कैसे आएगा?

यानी 'जेन जी' के युवा मतदाता 2029 में चुनाव जीतने का सबसे महत्वपूर्ण हथियार बन सकते हैं। 

'जेन अल्फा' पीढ़ी भी दे रही दस्तक
'जेन अल्फा' पीढ़ी, 2029 तक बहुत कम संख्या में वोट डालने की योग्यता हासिल करेगी. लेकिन एक अनुमान के मुताबिक तब तक उनकी आबादी 41.7 करोड़ से अधिक हो जाएगी. यानी अगले दशक में भारत में युवा आबादी का प्रभाव और बढ़ेगा. हाल ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने जेन जी और जेन अल्फा से बात करने की बात कही है. 6 अगस्त को वो इन दोनों पीढ़ियों के लोगों से संवाद करेंगे. यह वो पहल है जिसे आज के राजनीतिक दल शुरू कर रहे हैं. जो दल आज 'जेन जी' को समझेंगे, वे भविष्य में जेन अल्फा के मतदाताओं तक भी आसानी से पहुंच बना सकते हैं। 

हालांकि भारत की आबादी में और एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. यहां 18 वर्ष से कम आयुवर्ग के लोगों का अनुपात लगातार घट रहा है. वहीं 45 से 61 आयु वर्ग के लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. 62 वर्ष से अधिक आयु वाले लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। 

इसका मतलब यह भी है कि भविष्य की सरकारों को एक साथ दो अलग-अलग पीढ़ियों की जरूरतों को संतुलित करना होगा. जहां एक तरफ युवाओं के लिए रोजगार और अवसरों को उपलब्ध कराना चुनौती भरा होगा वहीं बुजुर्गों के लिए हेल्थ, पेंशन और सोशल सिक्योरिटी का इंतजाम भी करना चुनौतिपूर्ण होगा। 

चुनावी रणनीति पर क्या असर पड़ सकता है?
वैसे तो चुनावों में सोशल मीडिया का प्रवेश 2014 के चुनाव से ही हो गया है पर आगामी चुनावों में पार्टियां डिजिटल कैंपेन पर और अधिक फोकस कर सकती हैं. उनका फोकस युवा मतदाता यानी 'जेन जी' पर सबसे अधिक हो सकता है. यह भी संभव है कि केवल चुनावी वादे न किए जाएं, उन वादों को कैसे पूरा करेंगे इस पर भी बात हो. यानी अब चुनाव केवल क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों पर आधारित न हो कर भविष्य की अर्थव्यवस्था और युवाओं की आकांक्षाओं के मुद्दे पर भी लड़ा जा सकता है। 

भारत अपने जनसांख्यिकीय इतिहास के एक ऐसे पड़ाव पर खड़ा है जहां आगामी लोकसभा चुनाव 2029 तक 'जेन जी' न केवल देश की सबसे बड़ी वयस्क आबादी होगी, बल्कि सबसे अधिक डिजिटल रूप से जुड़ी, शिक्षित, जागरूक और संगठित पीढ़ी भी होगी. लिहाजा 2029 का लोकसभा चुनाव भारत की नई युवा राजनीति के 
उदय का चुनाव भी साबित हो सकता है। 

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