GST Rule 86B में उलझे व्यापारियों को राहत की आस, रिफंड पर प्रधान आयुक्त ने दिया भरोसा
50 लाख रुपए से अधिक मासिक टर्नओवर पर 1% नकद टैक्स की शर्त बनी परेशानी; टैक्स लॉ बार एसोसिएशन ने ब्याज-पेनल्टी और रिफंड का मुद्दा उठाया, मामलों की जांच के बाद राहत की उम्मीद

विवेक झा, भोपाल। जीएसटी के नियम 86B के तहत टैक्स का भुगतान करने के तरीके को लेकर व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ रही हैं। कुछ मामलों में व्यापारियों ने इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के जरिए पूरा टैक्स जमा कर दिया, लेकिन नियम के अनुसार निर्धारित 1% टैक्स नकद में जमा नहीं किया। अब ऐसे मामलों में ब्याज और पेनल्टी की कार्रवाई को लेकर विवाद सामने आ रहा है। व्यापारियों का तर्क है कि जब सरकार को पूरा टैक्स मिल चुका है, तो केवल भुगतान के तरीके में हुई चूक के कारण उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ना चाहिए।
इसी मुद्दे को लेकर टैक्स लॉ बार एसोसिएशन, भोपाल के प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को CGST भोपाल की प्रधान आयुक्त एन. पद्मश्री से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने नियम 86B से जुड़ी व्यावहारिक परेशानियों, ब्याज-पेनल्टी की कार्रवाई और नकद में दोबारा जमा की गई राशि के रिफंड का मुद्दा उठाया। एसोसिएशन के अनुसार, प्रधान आयुक्त ने मामलों की जांच के बाद नियमानुसार राहत और रिफंड की संभावनाओं पर सकारात्मक रुख जताया है।
क्या है GST Rule 86B, क्यों हो रही परेशानी?
GST Rule 86B के तहत निर्धारित शर्तों के अधीन उन पंजीकृत करदाताओं को, जिनका किसी महीने में कर योग्य टर्नओवर 50 लाख रुपए से अधिक है, अपनी आउटपुट टैक्स देनदारी का कम से कम 1% नकद में जमा करना होता है। यानी पूरी टैक्स देनदारी का भुगतान केवल इनपुट टैक्स क्रेडिट के जरिए नहीं किया जा सकता।
एसोसिएशन के मुताबिक, कुछ व्यापारी इस शर्त से अनजान थे या अनजाने में पूरी टैक्स देनदारी ITC के माध्यम से चुका बैठे। ऐसे मामलों में सरकार को टैक्स की पूरी राशि मिल गई, लेकिन भुगतान का निर्धारित तरीका पूरा नहीं हुआ। अब इसी तकनीकी चूक को लेकर व्यापारियों और कर अधिकारियों के बीच विवाद की स्थिति बन रही है।
पूरा टैक्स जमा, फिर ब्याज-पेनल्टी क्यों?
टैक्स लॉ बार एसोसिएशन ने बैठक में तर्क दिया कि जिन मामलों में व्यापारी ने अपनी पूरी टैक्स देनदारी ITC से चुका दी और रिटर्न में संबंधित जानकारी भी उपलब्ध थी, वहां भुगतान के तरीके में हुई गलती को टैक्स चोरी की मंशा के समान नहीं माना जाना चाहिए।
एसोसिएशन का कहना है कि कुछ जांच और ऑडिट मामलों में अधिकारियों की ओर से धारा 74 के तहत कार्रवाई करते हुए ब्याज और पेनल्टी की मांग की जा रही है। एसोसिएशन ने ऐसे मामलों में, जहां टैक्स चोरी की मंशा नहीं है और पूरा टैक्स पहले ही जमा हो चुका है, धारा 73 के तहत विचार करने की मांग उठाई। उसका तर्क है कि केवल भुगतान के तरीके में हुई चूक और जानबूझकर टैक्स छिपाने के मामलों में अंतर किया जाना चाहिए।
हालांकि, किस मामले में कौन-सी धारा लागू होगी, यह संबंधित तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगा। एसोसिएशन की मांग है कि ऐसे मामलों का निपटारा व्यापारियों की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाए।
नकद में दोबारा टैक्स जमा करने पर रिफंड की मांग
प्रतिनिधिमंडल ने यह मुद्दा भी उठाया कि यदि कोई व्यापारी नियम 86B की शर्त पूरी करने के लिए निर्धारित 1% राशि नकद में जमा कर देता है, जबकि वह राशि पहले ही ITC के माध्यम से टैक्स भुगतान में इस्तेमाल हो चुकी है, तो पहले भुगतान की गई राशि के समायोजन या रिफंड पर स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।
एसोसिएशन का कहना है कि ऐसे मामलों में व्यापारियों को लंबे समय तक रिफंड के लिए इंतजार नहीं करना पड़े। इससे उनकी कार्यशील पूंजी अनावश्यक रूप से नहीं फंसेगी और कारोबार पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव भी कम होगा।
प्रधान आयुक्त ने क्या कहा?
टैक्स लॉ बार एसोसिएशन के अनुसार, प्रधान आयुक्त एन. पद्मश्री ने नियम 86B से जुड़े मामलों पर सकारात्मक रुख व्यक्त किया। एसोसिएशन का कहना है कि प्रधान आयुक्त ने बताया कि जांच के बाद संबंधित व्यापारी को नियम के तहत 1% नकद भुगतान की शर्त से छूट देने का अधिकार आयुक्त के पास है। ऐसे कुछ आवेदनों पर पहले भी विचार किया गया है और आगे आने वाले मामलों की भी तथ्यों के आधार पर समीक्षा की जाएगी।
एसोसिएशन के मुताबिक, प्रधान आयुक्त ने संबंधित परिस्थितियों में रिफंड के मुद्दे पर भी व्यापारियों के अधिकार की बात कही। हालांकि, प्रत्येक मामले में राहत या रिफंड का निर्णय संबंधित रिकॉर्ड, जांच और लागू नियमों के आधार पर ही होगा।
समय पर समाधान से घट सकता है मुकदमों का बोझ
एसोसिएशन का मानना है कि नियम 86B से जुड़े मामलों में स्पष्टता और समय पर निर्णय होने से व्यापारियों को अनावश्यक अपील और कानूनी प्रक्रिया से बचाया जा सकता है। यदि भुगतान के तरीके में हुई चूक और वास्तविक टैक्स चोरी के मामलों के बीच अंतर स्पष्ट किया जाता है, तो विवादों का शुरुआती स्तर पर समाधान संभव हो सकता है।
बैठक में टैक्स लॉ बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज पारख, सचिव धीरज अग्रवाल, वरिष्ठ कर सलाहकार भूपेश खुराफिया, अधिवक्ता पलाश खुराफिया, जयंत जोशी और सीए विकास अग्रवाल शामिल रहे।
व्यापारियों की नजर अब इस बात पर है कि नियम 86B से जुड़े लंबित मामलों में जांच और रिफंड की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ती है। एसोसिएशन को उम्मीद है कि मामलों की तथ्यात्मक समीक्षा से उन कारोबारियों को राहत मिल सकेगी, जिन्होंने पूरा टैक्स जमा किया, लेकिन नकद भुगतान की निर्धारित शर्त पूरी नहीं कर पाए।





