संस्कृति के नाम पर जब दीवारें उठें, तो प्रेमचंद को पढ़िए

सांप्रदायिकता, साझा विरासत और मनुष्यता के सवाल आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं

लेखक: सुनील कुमार गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार

“साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है।” — मुंशी प्रेमचंद

कुछ विचार समय की सीमाओं में कैद नहीं होते। वे अपने दौर की सच्चाइयों को उजागर करते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आईना बन जाते हैं। मुंशी प्रेमचंद का यह कथन ऐसा ही एक विचार है, जो दशकों बाद भी हमें ठहरकर सोचने के लिए मजबूर करता है। जब संस्कृति के नाम पर समाज में विभाजन की रेखाएं खींची जाने लगें, जब भाषा, खानपान, पहनावे और धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को बांटने की कोशिश हो, तब प्रेमचंद को पढ़ना केवल साहित्यिक कर्म नहीं, बल्कि अपने समय और समाज को समझने की जरूरत बन जाता है।

मैंने अपने जीवन में हिंदी-उर्दू के जिन साहित्यकारों को सबसे अधिक पढ़ा और जिनकी रचनाओं से बार-बार संवाद किया, उनमें मुंशी प्रेमचंद का स्थान सर्वोपरि है। उनके उपन्यास गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि और गबन से लेकर ईदगाह, पंच परमेश्वर, कफन, नमक का दरोगा और सद्गति जैसी कहानियों तक, उनका साहित्य मेरे लिए समाज को देखने और समझने की खिड़की रहा है। मानसरोवर के आठ खंडों में संकलित उनकी अनेक कहानियों को मैंने कई-कई बार पढ़ा है। हर बार उनमें जीवन का कोई नया पहलू, समाज की कोई अनदेखी विसंगति और मनुष्य की पीड़ा का कोई नया अर्थ दिखाई दिया।

प्रेमचंद की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उनके साहित्य में मनुष्य की पहचान किसी एक धर्म, जाति या वर्ग तक सीमित नहीं होती। वहां किसान है, मजदूर है, स्त्री है, बच्चा है, गरीब है, वंचित है, शोषित है और समाज के हाशिये पर खड़ा वह व्यक्ति भी है, जिसकी आवाज अक्सर सत्ता और व्यवस्था के शोर में दब जाती है। उनकी रचनाओं के पात्र भूख, गरीबी, शोषण, छुआछूत, अन्याय और अपमान से जूझते हैं, लेकिन उनके भीतर एक बेहतर जीवन की आकांक्षा भी जीवित रहती है—ऐसा जीवन, जिसमें उन्हें भी सम्मान, समानता और न्याय मिल सके।

यही वह मानवीय दृष्टि है, जो प्रेमचंद को किसी एक समय, समुदाय या विचारधारा का लेखक होने से आगे ले जाकर भारतीय समाज का प्रतिनिधि साहित्यकार बनाती है।

संस्कृति खतरे में है—लेकिन किससे?

आज सार्वजनिक जीवन में एक वाक्य बार-बार सुनाई देता है—‘हमारी संस्कृति खतरे में है।’ कभी भाषा के नाम पर, कभी खानपान के नाम पर, कभी पहनावे और धार्मिक परंपराओं के नाम पर, तो कभी इतिहास की व्याख्या को लेकर संस्कृति की रक्षा का आह्वान किया जाता है। टेलीविजन की बहसों से लेकर राजनीतिक मंचों और सार्वजनिक आयोजनों तक, संस्कृति को बचाने की चिंता अक्सर मुखर दिखाई देती है।

लेकिन इस शोर के बीच कुछ बुनियादी सवाल पीछे छूट जाते हैं। आखिर संस्कृति खतरे में किससे है? उसकी रक्षा कौन कर रहा है और किसके लिए? क्या संस्कृति की रक्षा का अर्थ दूसरों की जीवनशैली, भाषा, आस्था और परंपराओं को संदेह की नजर से देखना है? क्या किसी एक समुदाय की पहचान को ही पूरे देश की संस्कृति मान लिया जाना चाहिए? और क्या संस्कृति के नाम पर समाज में खड़ी की जाने वाली दीवारें वास्तव में हमारी सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करती हैं?

इन सवालों पर विचार करते हुए प्रेमचंद का लेख ‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’ याद आता है। 15 जनवरी 1934 को प्रकाशित इस लेख में उन्होंने सांप्रदायिक मानसिकता के उस चरित्र को उजागर किया था, जो अपनी राजनीति और अपने हितों को संस्कृति की रक्षा के आवरण में प्रस्तुत करती है।

प्रेमचंद का यह कथन आज भी इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि वह हमें संस्कृति के दावों से आगे बढ़कर उनके पीछे छिपे उद्देश्यों को देखने की दृष्टि देता है। संस्कृति के प्रति प्रेम स्वाभाविक है, लेकिन जब इसी प्रेम का इस्तेमाल दूसरे समुदाय के प्रति घृणा पैदा करने के लिए होने लगे, तब हमें सावधान हो जाना चाहिए।

प्रेमचंद के लिए संस्कृति किसी एक समुदाय की संपत्ति नहीं थी

31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गांव में जन्मे धनपत राय श्रीवास्तव, जिन्हें दुनिया मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानती है, ऐसे समय में साहित्य रच रहे थे, जब भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। सामाजिक विषमता, जातिगत भेदभाव, आर्थिक शोषण और धार्मिक विभाजन भारतीय समाज की बड़ी चुनौतियां थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के साथ राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर भी बहसें चल रही थीं।

प्रेमचंद ने अपने साहित्य और वैचारिक लेखन में इस जटिल सामाजिक वास्तविकता को गहराई से समझने का प्रयास किया। उनके लिए संस्कृति कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जिसे किसी एक समुदाय ने बनाया हो और जिस पर केवल उसी का अधिकार हो। संस्कृति सदियों के सह-अस्तित्व, संवाद, आदान-प्रदान और सामूहिक अनुभवों से निर्मित होती है।

भाषाएं एक-दूसरे से शब्द ग्रहण करती हैं। खानपान में नए स्वाद जुड़ते हैं। संगीत और कलाएं विभिन्न परंपराओं से प्रभावित होती हैं। पहनावे, लोकाचार, त्योहारों और सामाजिक व्यवहार में समय के साथ बदलाव आते हैं। भारत की सांस्कृतिक यात्रा इसी मेल-जोल और निरंतर परिवर्तन की यात्रा रही है।

हमारे गांवों, कस्बों और शहरों में सदियों से अनेक समुदाय साथ रहते आए हैं। उनके बीच धार्मिक मान्यताओं में अंतर रहा है, लेकिन जीवन के अनेक अनुभव साझा रहे हैं। खेतों में काम करने वाले किसान, बाजार में कारोबार करने वाले व्यापारी, कारीगर, मजदूर, कलाकार और आम नागरिक अपने दैनिक जीवन में एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं।

यही साझा जीवन भारतीय संस्कृति की वास्तविक ताकत है।

यदि संस्कृति को किसी एक धर्म, जाति या समुदाय की सीमा में बांध दिया जाए, तो उसके ऐतिहासिक विकास और सामाजिक विविधता की अनदेखी होती है। प्रेमचंद का साहित्य हमें इसी संकीर्ण दृष्टि से बाहर निकलने की प्रेरणा देता है। वह बताता है कि संस्कृति किसी बंद दरवाजे के भीतर सुरक्षित रखी जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि समाज के बीच जीवित रहने वाली प्रक्रिया है।

सांप्रदायिकता की असली राजनीति को समझिए

प्रेमचंद सांप्रदायिकता को केवल धार्मिक मतभेद के रूप में नहीं देखते थे। उनकी चिंता उस मानसिकता को लेकर थी, जो समुदाय की पहचान को संकट में बताकर लोगों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करती है।

जब किसी समुदाय से यह कहा जाता है कि उसकी संस्कृति, धर्म या अस्तित्व दूसरे समुदाय के कारण खतरे में है, तो उसके भीतर भय और असुरक्षा पैदा हो सकती है। यही भय धीरे-धीरे सामाजिक अविश्वास और राजनीतिक ध्रुवीकरण का आधार बनता है। ऐसी परिस्थितियों में लोगों की वास्तविक समस्याएं पीछे छूटने लगती हैं और पहचान की राजनीति केंद्र में आ जाती है।

प्रेमचंद की दृष्टि में हिंदू सांप्रदायिकता और मुस्लिम सांप्रदायिकता एक-दूसरे का समाधान नहीं थीं। दोनों ही उस विभाजनकारी मानसिकता के रूप हैं, जो मनुष्य को उसकी साझा सामाजिक वास्तविकता से काटकर धार्मिक पहचान के खांचे में सीमित कर देती है।

यह समझना जरूरी है कि धार्मिक आस्था और सांप्रदायिक राजनीति एक ही चीज नहीं हैं। अपने धर्म का पालन करना, अपनी परंपराओं से प्रेम करना और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोना किसी भी व्यक्ति का स्वाभाविक अधिकार है। समस्या तब पैदा होती है, जब अपनी पहचान को श्रेष्ठ साबित करने के लिए दूसरे की पहचान को छोटा किया जाने लगे; जब धार्मिक आस्था के आधार पर नागरिकों के अधिकारों का मूल्यांकन होने लगे; या जब सामाजिक और राजनीतिक लाभ के लिए समुदायों के बीच अविश्वास को बढ़ावा दिया जाए।

प्रेमचंद का विचार हमें इसी अंतर को पहचानने की सीख देता है।

गोदान से ईदगाह तक—मनुष्य की पीड़ा ही केंद्र में

प्रेमचंद के विचारों को समझने के लिए उनके निबंधों के साथ उनकी कहानियों और उपन्यासों को पढ़ना भी जरूरी है। उनका साहित्य इस बात का प्रमाण है कि वे समाज को धार्मिक पहचान के चश्मे से नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन, उसकी परिस्थितियों और उसके संघर्षों के माध्यम से देखते थे।

गोदान का होरी केवल एक किसान नहीं है। वह उस ग्रामीण व्यवस्था का प्रतिनिधि है, जिसमें मेहनत करने वाला व्यक्ति कर्ज, सामाजिक दबाव और आर्थिक शोषण के बीच अपनी गरिमा बचाने के लिए संघर्ष करता है। उसकी त्रासदी किसी एक धार्मिक समुदाय की त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यापक सामाजिक संरचना की कहानी है, जिसमें गरीब की मेहनत का पूरा प्रतिफल उसे नहीं मिल पाता।

ईदगाह का हामिद अपनी दादी अमीना के लिए चिमटा खरीदता है। मेले में दूसरे बच्चों के आकर्षण और खिलौनों के बीच उसका निर्णय त्याग, संवेदना और पारिवारिक प्रेम का परिचय देता है। इस कहानी का प्रभाव इसलिए व्यापक है, क्योंकि हामिद की गरीबी और उसकी भावनाएं किसी धार्मिक सीमा में बंधी नहीं हैं। पाठक उसके अनुभव में अपने परिवार, अपने बचपन और अपने समाज की झलक देख सकता है।

पंच परमेश्वर न्याय और निष्पक्षता के महत्व को रेखांकित करती है। सद्गति जातिगत शोषण की अमानवीयता को सामने लाती है। कफन गरीबी, सामाजिक विडंबना और मानवीय संवेदना के जटिल प्रश्न उठाती है। रंगभूमि में सत्ता, पूंजी और कमजोर मनुष्य के बीच संघर्ष दिखाई देता है।

इन रचनाओं को साथ रखकर देखें तो स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद के लिए साहित्य का उद्देश्य केवल किसी विचार का प्रचार करना नहीं था। वे मनुष्य और समाज के भीतर मौजूद अंतर्विरोधों को सामने लाते थे। उनके पात्रों की पीड़ा पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि वहां कमजोर और वंचित व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।

प्रेमचंद की यही मानवीय दृष्टि सांप्रदायिकता के विरुद्ध सबसे मजबूत नैतिक आधार प्रस्तुत करती है। जब साहित्य हमें दूसरे मनुष्य की पीड़ा को महसूस करना सिखाता है, तब किसी समुदाय के प्रति अंधी घृणा के लिए जगह कम होती है।

संस्कृति की बहस में रोटी, रोजगार और शिक्षा कहां हैं?

प्रेमचंद की वैचारिक दृष्टि का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों को आम आदमी के जीवन से जोड़कर देखते हैं। उनके साहित्य में भूख, कर्ज, बेरोजगारी, शोषण और सामाजिक अपमान जैसी समस्याएं बार-बार सामने आती हैं। वे उन लोगों की दुनिया को केंद्र में लाते हैं, जिनके लिए जीवन की बुनियादी जरूरतें ही सबसे बड़ी चुनौती होती हैं।

आज भी जब संस्कृति के नाम पर तीखी बहसें होती हैं, तो कुछ सवाल पूछना जरूरी है।

क्या उन बहसों में बेरोजगार युवाओं के भविष्य पर पर्याप्त चर्चा होती है? क्या किसान की आय, मजदूर की मजदूरी और छोटे कारोबारियों की परेशानियों को उतनी ही गंभीरता मिलती है? क्या महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे सवाल सार्वजनिक विमर्श में अपनी जगह बनाए रखते हैं?

संस्कृति पर चर्चा होनी चाहिए। इतिहास, परंपरा, भाषा और धार्मिक विरासत पर संवाद भी जरूरी है। लेकिन इन विषयों पर बातचीत का उद्देश्य समाज को बेहतर समझना और विविधता का सम्मान करना होना चाहिए, न कि वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाना।

जब लोगों की रोजमर्रा की चिंताओं की जगह केवल पहचान से जुड़ी उत्तेजक बहसें ले लेती हैं, तब यह देखना जरूरी हो जाता है कि ऐसी बहसों से लाभ किसे मिल रहा है और उनकी सामाजिक कीमत कौन चुका रहा है।

प्रेमचंद का साहित्य हमें किसी तैयार राजनीतिक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए बाध्य नहीं करता। वह इससे अधिक महत्वपूर्ण काम करता है—वह हमें सवाल पूछना सिखाता है। वह हमें यह देखने के लिए प्रेरित करता है कि किसी भी विचार, व्यवस्था या राजनीति का असर अंततः आम मनुष्य के जीवन पर क्या पड़ता है।

भारतीय संविधान और साझा संस्कृति का रिश्ता

स्वतंत्र भारत को प्रेमचंद ने नहीं देखा, लेकिन उनके साहित्य में जिस सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की आकांक्षा दिखाई देती है, उसका संबंध आज के संवैधानिक मूल्यों से सहज रूप से जोड़ा जा सकता है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्श शामिल हैं। ये आदर्श केवल कानूनी शब्द नहीं हैं; वे ऐसे समाज की कल्पना प्रस्तुत करते हैं, जिसमें नागरिकों को सम्मान के साथ जीने का अवसर मिले और विविधताओं के बावजूद उनके बीच समान नागरिकता का संबंध कायम रहे।

संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर कुछ प्रकार के भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जो संविधान में निर्धारित सीमाओं के अधीन है।

इन प्रावधानों का मूल संदेश यह है कि भारत की विविधता के बीच प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।

यहां प्रेमचंद के विचारों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। अपनी संस्कृति से प्रेम करना और दूसरी संस्कृति का अपमान करना अलग-अलग बातें हैं। धार्मिक परंपरा का सम्मान करना और उसे दूसरों पर थोपना अलग-अलग बातें हैं। किसी समुदाय की भावनाओं को समझना और उसी के आधार पर दूसरे नागरिक की स्वतंत्रता सीमित करना भी एक जैसी बातें नहीं हैं।

एक लोकतांत्रिक समाज की परिपक्वता इसी में है कि वह धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए समान नागरिकता के सिद्धांत को बनाए रखे। संस्कृति की रक्षा का दावा तभी सार्थक है, जब वह मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता और सह-अस्तित्व को मजबूत करे।

1934 से 2026 तक—सवाल बदले हैं, चिंता नहीं

प्रेमचंद का समय और आज का भारत एक जैसे नहीं हैं। उस समय देश औपनिवेशिक शासन के अधीन था। आज भारत एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसके पास अपना संविधान, निर्वाचित संस्थाएं और नागरिक अधिकारों की व्यवस्था है। संचार के साधन, तकनीक और सार्वजनिक बहस के मंच भी बदल चुके हैं।

फिर भी कुछ बुनियादी प्रश्न आज भी हमारे सामने हैं। विविधता को हम अपनी ताकत मानते हैं या चुनौती? संस्कृति को साझा विरासत के रूप में देखते हैं या किसी एक समूह के अधिकार के रूप में? क्या राजनीतिक और सामाजिक मतभेदों के बीच भी हम दूसरे व्यक्ति की गरिमा का सम्मान कर सकते हैं?

आज सूचना के तेज प्रसार के कारण विचारों और भावनाओं का प्रभाव बहुत व्यापक हो गया है। किसी घटना, बयान या विवाद की अधूरी जानकारी भी समाज में तेजी से फैल सकती है। ऐसे माहौल में जिम्मेदार नागरिकता का अर्थ केवल अपनी मान्यताओं को व्यक्त करना नहीं, बल्कि तथ्यों को समझना, असहमति को सुनना और किसी समुदाय के प्रति सामान्यीकृत घृणा से बचना भी है।

प्रेमचंद को पढ़ना हमें इसी विवेक की ओर ले जाता है। उनकी कहानियां किसी समुदाय को एकरूप मानकर उसके बारे में निर्णय देने के बजाय मनुष्य की व्यक्तिगत परिस्थितियों और सामाजिक संबंधों को समझने का अवसर देती हैं। वे यह भी बताती हैं कि समाज में अन्याय को केवल भावनात्मक नारों से दूर नहीं किया जा सकता; उसके लिए वास्तविक परिस्थितियों और व्यवस्थाओं पर विचार करना आवश्यक है।

इसीलिए प्रेमचंद आज केवल हिंदी साहित्य के महान लेखक नहीं हैं। वे हमारे सामाजिक विवेक के भी महत्वपूर्ण संदर्भ हैं।

प्रेमचंद को याद करना, मनुष्य को याद करना है

8 अक्टूबर 1936 को प्रेमचंद का निधन हुआ। वे स्वतंत्र भारत को नहीं देख सके, लेकिन उनका साहित्य उस भारत की कल्पना से जुड़ा दिखाई देता है, जिसमें समाज की विविध पहचानें एक-दूसरे के साथ मौजूद हैं और किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी मानवीयता, कर्म और परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।

उनकी रचनाओं में गांव भी है और शहर भी, खेत भी है और बाजार भी, धार्मिक आस्था भी है और सामाजिक रूढ़ियों पर सवाल भी। वहां शोषित और शोषक हैं, संघर्ष है, करुणा है और बेहतर समाज की संभावना भी।

प्रेमचंद को उनकी पुण्यतिथि पर याद करने का अर्थ केवल उनकी महानता का बखान करना या उनकी रचनाओं की सूची दोहराना नहीं है। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब हम उनके उठाए सवालों को अपने समय की कसौटी पर परखेंगे।

जब संस्कृति के नाम पर दीवारें खड़ी की जाएं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि संस्कृति मनुष्य के लिए है, मनुष्य संस्कृति के लिए नहीं। जब धार्मिक पहचान के आधार पर समाज को बांटने की कोशिश हो, तो हमें उस साझा जीवन को देखना चाहिए, जिसने भारत की सांस्कृतिक विरासत को आकार दिया है। और जब किसी बहस में रोटी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, समानता और गरिमा जैसे सवाल पीछे छूटने लगें, तो हमें प्रेमचंद के उन पात्रों की याद करनी चाहिए, जिनका पूरा जीवन इन्हीं बुनियादी जरूरतों के इर्द-गिर्द घूमता है।

आखिरकार, संस्कृति की असली पहचान इस बात से नहीं होती कि हम उसके नाम पर कितने ऊंचे नारे लगाते हैं, बल्कि इससे होती है कि हम अपने समाज में दूसरे मनुष्य के लिए कितनी जगह छोड़ते हैं।

क्या संस्कृति वह है, जो हमें एक-दूसरे से अलग करती है, या वह, जो हमें अपनी विविधताओं के बावजूद साथ रहना सिखाती है? क्या संस्कृति की रक्षा का अर्थ अपनी पहचान को सर्वोपरि बनाना है, या उस मानवीय संवेदना को बचाए रखना है, जिससे संस्कृति जन्म लेती है और जीवित रहती है?

प्रेमचंद का साहित्य हमें इन सवालों से बचने नहीं देता। वह हमें बार-बार मनुष्य के पास लौटाता है—उस मनुष्य के पास, जो किसी धर्म, जाति या वर्ग की पहचान से पहले अपनी गरिमा, अपनी आकांक्षाओं और अपने अधिकारों के साथ एक जीवित इंसान है।

इसलिए, जब संस्कृति के नाम पर दीवारें उठें, तो प्रेमचंद को पढ़िए। क्योंकि संस्कृति की रक्षा मनुष्यता को बांटकर नहीं, उसे साथ लेकर चलने में है।

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