आईडीबीआई बैंक के निजीकरण के विरोध में देशव्यापी हड़ताल, भोपाल में कर्मचारियों ने निकाली रैली
10 हजार से अधिक अधिकारी-कर्मचारी दो दिवसीय हड़ताल में शामिल, एमपी नगर में प्रदर्शन कर सरकार के फैसले के खिलाफ की नारेबाजी; यूएफबीयू ने भी दिया समर्थन

विवेक झा, भोपाल। आईडीबीआई बैंक के निजीकरण के विरोध में बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों की दो दिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल के पहले दिन देशभर में बैंकिंग कामकाज प्रभावित रहा। यूनाइटेड फोरम ऑफ आईडीबीआई ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉइज के आह्वान पर 2 और 3 नवंबर को आयोजित इस हड़ताल में देशभर की 2,000 से अधिक शाखाओं के 10 हजार से अधिक अधिकारी-कर्मचारी शामिल हुए। हड़ताल के चलते कई स्थानों पर बैंक का कामकाज ठप रहा। राजधानी भोपाल में भी आईडीबीआई बैंक के सैकड़ों अधिकारी और कर्मचारी हड़ताल पर रहे तथा उन्होंने निजीकरण के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन, रैली और सभा आयोजित की।
भोपाल में सोमवार सुबह 10 बजे आईडीबीआई बैंक की एमपी नगर जोन-2 स्थित शाखा के सामने हड़ताली कर्मचारी और अधिकारी एकत्रित हुए। उन्होंने निजीकरण के विरोध और बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के स्वरूप को बनाए रखने की मांग को लेकर जोरदार नारेबाजी की। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने रैली निकाली। रैली महाराणा प्रताप नगर जोन-2 स्थित बैंक शाखा से शुरू होकर एमपी नगर क्षेत्र से गुजरी और वापस उसी स्थान पर पहुंचकर सभा में परिवर्तित हो गई।

अन्य बैंकों के कर्मचारियों ने भी दिया समर्थन
आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों की हड़ताल को समर्थन देने के लिए यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) के बैनर तले विभिन्न बैंकों के अधिकारी और कर्मचारी भी प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने काले बैज धारण कर निजीकरण के विरोध में एकजुटता दिखाई। अन्य बैंकों के कर्मचारियों की सहभागिता से प्रदर्शन को व्यापक समर्थन मिला।
सभा को यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस और आईडीबीआई बैंक की ट्रेड यूनियनों के पदाधिकारियों वीके शर्मा, दीपक रत्न शर्मा, अनिल परमार, विकास सिंह, नागेश पांचाल, आकांक्षा गुप्ता, गुणशेखरण, भगवान स्वरूप कुशवाहा, एमएस जयशंकर, जेपी दुबे, सत्येंद्र चौरसिया, श्रीपाद घोटनकर, एसके गुप्ता और अनंत खरे ने संबोधित किया।
सार्वजनिक निवेश से पुनर्जीवित बैंक के निजीकरण का विरोध
वक्ताओं ने कहा कि आईडीबीआई बैंक का पुनरुद्धार सार्वजनिक धन और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के निवेश से हुआ है। ऐसे में बैंक का निजीकरण जनहित के विरुद्ध है। बैंक की परिसंपत्तियों और उसमें किए गए सार्वजनिक निवेश की रक्षा करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक निवेश, कर्मचारियों की मेहनत और राष्ट्रीय संपत्ति का लाभ आम जनता के हित में होना चाहिए।
प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार से आईडीबीआई बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल रद्द करने और बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के स्वरूप को बनाए रखने की मांग की। उनका कहना था कि बैंक केवल एक व्यावसायिक संस्थान नहीं है, बल्कि इसमें सरकार और एलआईसी के माध्यम से बड़ी मात्रा में सार्वजनिक निवेश जुड़ा हुआ है।
94 प्रतिशत हिस्सेदारी सरकार और एलआईसी के पास होने का हवाला
हड़ताल के आयोजकों के अनुसार, वर्तमान में आईडीबीआई बैंक में भारत सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम की कुल हिस्सेदारी लगभग 94 प्रतिशत है। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) द्वारा बैंक की 60 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के निर्णय के विरोध में कर्मचारी और अधिकारी आंदोलन कर रहे हैं।
प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि बैंक की हिस्सेदारी कनाडा की निवेशक कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग को बेचने का निर्णय लिया गया है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इस प्रक्रिया के आगे बढ़ने से बैंक का सार्वजनिक क्षेत्र का स्वरूप समाप्त हो जाएगा और वह विदेशी निजी स्वामित्व में चला जाएगा। इसी आशंका के चलते अधिकारी और कर्मचारी निजीकरण का विरोध कर रहे हैं।
जसवंत सिंह के पुराने आश्वासन का भी उठाया मुद्दा
सभा में वक्ताओं ने दिसंबर 2003 में संसद में हुई चर्चा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय आईडीबीआई अधिनियम को निरस्त करने और आईडीबीआई को डीम्ड बैंकिंग कंपनी में परिवर्तित करने संबंधी विधेयक पर चर्चा के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री एवं भाजपा नेता जसवंत सिंह ने आश्वासन दिया था कि सरकार किसी भी परिस्थिति में आईडीबीआई में अपनी न्यूनतम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखेगी।
वक्ताओं ने आरोप लगाया कि वर्तमान में निजीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाकर उस पुराने आश्वासन की भावना को दरकिनार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बैंक के सार्वजनिक स्वरूप को बनाए रखना देश और आम जनता के हित में है।
मांगें नहीं मानीं तो आंदोलन होगा तेज
हड़ताल कर रहे संगठनों ने स्पष्ट किया कि यदि केंद्र सरकार निजीकरण के फैसले पर पुनर्विचार नहीं करती और उनकी मांगों पर सकारात्मक पहल नहीं करती है, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। वक्ताओं ने अनिश्चितकालीन हड़ताल सहित आगे के कड़े आंदोलनात्मक कदम उठाने की चेतावनी भी दी।
यूनाइटेड फोरम ऑफ आईडीबीआई ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉइज के प्रवक्ता अनिल परमार ने कहा कि बैंक के अधिकारी और कर्मचारी सार्वजनिक निवेश तथा राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। संगठन की मांग है कि आईडीबीआई बैंक का निजीकरण तत्काल रोका जाए और उसका सार्वजनिक क्षेत्र का स्वरूप बरकरार रखा जाए।





