CJI सूर्यकांत की युवा वकीलों को नसीहत, कहा- न्यायिक संस्थानों को मजबूत करना आपकी जिम्मेदारी

नई दिल्ली
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार को एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि बीते आठ दशकों में देश ने कई बड़ी चुनौतियों को पार किया है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उन्होंने युवा लॉ ग्रैजुएट और वकीलों से आह्वान किया कि वे देश और न्यायिक व्यवस्था के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को संभालने के लिए तैयार रहें।

मुख्य न्यायाधीश ने युवा वकीलों को प्रेरित करते हुए कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से बार (Bar) जिस जिम्मेदारी को निभाता आ रहा है, वह जल्द ही नई पीढ़ी के कंधों पर होगी। उन्होंने कहा, "न्याय के जिन संस्थानों को आपसे पहली पीढ़ियों ने बनाया और मजबूत किया है उन्हें संरक्षित करना और आगे बढ़ाना अब आपकी जिम्मेदारी है।" उन्होंने कहा कि बार और बेंच युवा वकीलों के विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। उन्हें मार्गदर्शन और अवसर प्रदान किए जाएंगे।

CJI ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा कि आज वकालत का क्षेत्र अधिक प्रतिस्पर्धी हो गया है और प्रैक्टिस जमाने का दबाव रहता है। उन्होंने युवा पीढ़ी की बुद्धिमत्ता, क्षमता और न्याय के प्रति समर्पण पर पूरा विश्वास जताया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी तकनीक के साथ बड़ी हुई है और वे अदालत में इस क्षमता का बेहतरीन उपयोग कर रहे हैं। वे समानता, समावेशिता और न्याय की पहुंच जैसे सामाजिक मुद्दों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं।

स्वतंत्रता संग्राम और कानून का गहरा संबंध
CJI सूर्यकांत ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में वकालत के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि हमारा स्वतंत्रता संग्राम मुख्य रूप से कोई सशस्त्र विद्रोह नहीं था, बल्कि कानून की भाषा, याचिकाओं और सार्वजनिक बहसों के माध्यम से औपनिवेशिक शासन की वैधता को दी गई एक सतत चुनौती थी। उन्होंने महात्मा गांधी, डॉ. बीआर अंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल, मोतीलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय का जिक्र करते हुए कहा कि ये सभी महान नेता वकील थे। इससे साबित होता है कि कानूनी पेशा स्वतंत्रता संग्राम का मूकदर्शक नहीं, बल्कि एक अभिन्न अंग था। उन्होंने कहा कि इन दिग्गजों के काम ने हमें सिखाया कि कानून का उद्देश्य केवल नियम बनाना या शासन करना नहीं है, बल्कि न्याय देना, स्वतंत्रता की रक्षा करना और मानवीय गरिमा को बनाए रखना है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आज भी अदालतें उसी सिद्धांत पर काम कर रही हैं। अदालतें एक ऐसा मंच हैं जहां समाज के विभिन्न वर्गों के लोग अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने, मनमानी कार्रवाइयों को चुनौती देने और कानून के समक्ष समान व्यवहार की मांग करने आते हैं।

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