2030 से पहले थम सकता है भारत में CO2 उत्सर्जन! चौंकाने वाले संकेत, 2025 में CO2 उत्सर्जन केवल 0.7% बढ़ा

भोपाल 

एक नए विश्लेषण से पता चला है कि भारत के कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में वर्ष 2025 में केवल 0.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो दो दशकों से अधिक समय में सबसे धीमी वृद्धि है।

जलवायु विज्ञान, नीति और ऊर्जा पर केंद्रित ब्रिटेन स्थित ऑनलाइन प्रकाशन कार्बन ब्रीफ के लिए सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, भारत के कुल कार्बन2 उत्सर्जन के लगभग आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार विद्युत क्षेत्र से होने वाला उत्सर्जन 2025 में लगभग 3.8 प्रतिशत कम हो गया और यह उस वर्ष के कुल उत्सर्जन में कमी का प्रमुख कारण हो सकता है।

हाल के वर्षों में भारत के CO2 उत्सर्जन में 4 से 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो विश्व में सबसे तेज़ वृद्धि दरों में से एक है। विश्लेषण के अनुसार, 2025 में 0.7 प्रतिशत की वृद्धि कोविड काल को छोड़कर 2001 के बाद से सबसे कम थी।

भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कार्बन डाइऑक्साइड का योगदान लगभग 80 प्रतिशत है । भारत के उत्सर्जन की वृद्धि दर में कमी आना पर्यावरण की दृष्टि से वैश्विक स्तर पर अच्छी खबर है, क्योंकि भारत ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती या औद्योगिक गतिविधियों और मांग में गिरावट का संकेत भी हो सकता है।

हालांकि आधिकारिक उत्सर्जन डेटा तैयार करने और संकलित करने में वर्षों लग जाते हैं – भारत के उत्सर्जन पर नवीनतम आधिकारिक डेटा 2020 से संबंधित है – सीआरईए जैसे अध्ययन देश के उत्सर्जन का अनुमान लगाने के लिए बिजली उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन और ईंधन खपत पर आवधिक डेटा जैसे विभिन्न संकेतकों का उपयोग करते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक उत्सर्जन की धीमी पड़ती यह रफ्तार कोई संयोग नहीं, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र में गहरे बदलाव का संकेत है। विशेषज्ञों के मुताबिक, स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ते कदम, कोयला आधारित बिजली में गिरावट और बिजली मांग की धीमी रफ्तार इन तीनों ने मिलकर नई उम्मीदें पैदा की हैं।

ऊर्जा क्षेत्र बना बदलाव की धुरी
रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ा और निर्णायक बदलाव बिजली क्षेत्र में देखने को मिला है, जहां 2025 में उत्सर्जन में 3.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इसके पीछे स्वच्छ ऊर्जा क्षमता में रिकॉर्ड बढ़ोतरी बड़ी वजह रही, जिससे हर साल करीब 90 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली उत्पादन की संभावना तैयार हुई है।

वहीं, बिजली की मांग में भी साफ सुस्ती दिखी, जो 2019 से 2023 के बीच 7.4 फीसदी की दर से बढ़ रही थी, वह 2025 में घटकर करीब एक फीसदी रह गई।

ये संकेत साफ तौर पर दर्शाते हैं कि अब देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में स्वच्छ ऊर्जा तेजी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और पारंपरिक स्रोतों की पकड़ कमजोर पड़ने लगी है।

जीवाश्म ईंधनों की कमजोर पड़ती पकड़
विश्लेषण में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि 2025 में तेल, गैस और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों की मांग में भी नरमी देखी गई, जो ऊर्जा क्षेत्र में बदलती प्राथमिकताओं की कहानी कहती है। तेल की मांग में हो रही वृद्धि सिमटकर महज 0.4 फीसदी रह गई, जबकि गैस की मांग में 4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

सबसे बड़ा बदलाव आयातित कोयले में देखने को मिला, जिसकी खपत 20 फीसदी तक घट गई, वहीं गैस आयात में भी 6 फीसदी की कमी आई है। ये आंकड़े सिर्फ गिरावट नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत हैं।

यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत अब धीरे-धीरे विदेशी ईंधनों पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, जिससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो रही है, बल्कि देश वैश्विक ईंधन संकटों के झटकों से भी खुद को बेहतर तरीके से बचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

उद्योग बढ़ा रहे उत्सर्जन
हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तस्वीर पूरी तरह सकारात्मक नहीं है, क्योंकि उद्योग अब भी उत्सर्जन बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

खासकर इस्पात और सीमेंट जैसे बुनियादी उद्योगों में तेजी से विस्तार देखने को मिला है, जहां इस्पात उत्पादन में 8 फीसदी और सीमेंट उत्पादन में 10 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। यही वजह है कि कुल कार्बन उत्सर्जन में हल्की बढ़ोतरी बनी रही, जो यह संकेत देती है कि स्वच्छ ऊर्जा की प्रगति के बावजूद औद्योगिक क्षेत्र में बदलाव अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

क्या आ गया निर्णायक मोड़?
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का बिजली क्षेत्र अब एक 'टर्निंग पॉइंट' पर पहुंच सकता है, जहां स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ोतरी, बिजली मांग से बराबरी या उससे आगे निकल जाए।

सीआरईए के प्रमुख विश्लेषक लाउरी मायल्लीवीरता के मुताबिक अगर यही रुझान जारी रहा तो यह कोयला आधारित बिजली में स्थाई गिरावट की शुरुआत हो सकती है। दिलचस्प बात यह है कि गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्य पहले ही इस बदलाव की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि देश के लिए 2026 एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है, जब अक्षय ऊर्जा क्षमता में बढ़ोतरी पहली बार बिजली मांग के विस्तार को पीछे छोड़ दे, यह बदलाव भारत के बिजली क्षेत्र की दिशा और भविष्य दोनों को निर्णायक रूप से बदलने का संकेत होगा।

रिपोर्ट और सीआरईए से जुड़ी विश्लेषक अनुभा अग्रवाल का इस बारे में कहना है कि जीवाश्म ईंधनों की खपत में गिरावट से न सिर्फ आयात घटा है, बल्कि वैश्विक तेल-गैस संकट के असर से भी देश को राहत मिली है। उनका कहना है कि 2025 में तापीय बिजली संयंत्रों में आयातित कोयले की खपत 20 फीसदी तक घट गई, जबकि कुल गैस आयात में भी 6 फीसदी की कमी दर्ज की गई। यह बदलाव बेहद अहम है, क्योंकि इससे देश की मौजूदा वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति संकट के प्रति संवेदनशीलता कम हुई है।

उनके मुताबिक, स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना सिर्फ जलवायु के लिए नहीं, बल्कि बेहतर हवा और मजबूत ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।

हालांकि इस सकारात्मक रुझान के बीच एक चिंता भी बनी हुई है। भारत अभी भी कोयला आधारित बिजली क्षमता और जीवाश्म ईंधन आधारित उद्योगों के विस्तार की योजना बना रहा है, जो आने वाले वर्षों में उत्सर्जन की दिशा तय करेगा।

बिजली क्षेत्र में आया बड़ा बदलाव

इस सकारात्मक बदलाव का सबसे बड़ा कारण बिजली क्षेत्र में सुधार है। बिजली पैदा करने के दौरान होने वाले उत्सर्जन में 3.8% की कमी आई है। इसके पीछे दो मुख्य कारण रहे:-

    रिकॉर्ड सौर और पवन ऊर्जा: भारत ने स्वच्छ ऊर्जा (Renewable Energy) बनाने की क्षमता में ऐतिहासिक बढ़ोतरी की है।

    बिजली की कम मांग: पिछले कुछ वर्षों में बिजली की मांग जहाँ 7% से ज्यादा की रफ़्तार से बढ़ रही थी, वह 2025 में घटकर मात्र 1% रह गई।

इन कारणों से कोयले से बनने वाली बिजली पर निर्भरता कम हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 वह साल हो सकता है जब नई स्वच्छ ऊर्जा की रफ़्तार बिजली की कुल मांग से भी आगे निकल जाएगी।

विदेशी ईंधन पर निर्भरता हुई कम

भारत ने न केवल प्रदूषण कम किया, बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा को भी मज़बूत किया है। विश्लेषण बताता है कि:

    बिजली घरों में इस्तेमाल होने वाले आयातित कोयले में 20% की भारी कमी आई है।
    गैस के आयात में भी 6% की गिरावट दर्ज की गई।

    पेट्रोल-डीजल (तेल) की मांग में भी नाममात्र (0.4%) की वृद्धि हुई।

CREA की विश्लेषक अनुभा अग्रवाल के अनुसार, विदेशी ईंधन पर निर्भरता कम होने से वैश्विक बाज़ारों में होने वाली उथल-पुथल का असर भारत पर कम पड़ेगा, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर है।
चुनौतियां अभी भी बाकी हैं।

विश्लेषण में विद्युत क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में 3.8 प्रतिशत की गिरावट के दो मुख्य कारण बताए गए हैं – सौर और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार में रिकॉर्ड वृद्धि और बिजली की मांग में गिरावट, जो 2019 से 2023 के बीच औसतन लगभग 7.4 प्रतिशत से घटकर पिछले वर्ष 1 प्रतिशत रह गई थी। अपेक्षाकृत हल्की गर्मी के कारण एयर कंडीशनर की मांग में कमी और अच्छी मानसूनी बारिश ने बिजली की मांग में इस गिरावट में योगदान दिया।

भारत ने 2025 में 48 गीगावाट से अधिक नई नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता स्थापित की, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 70 प्रतिशत अधिक है। इस तीव्र विस्तार के कारण भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों पर आधारित है। सरकार द्वारा बुधवार को घोषित नए निर्णयों के अनुसार, देश 2035 तक इस हिस्सेदारी को बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने की योजना बना रहा है।

विश्लेषण के अनुसार, 2025 में भारत के कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में मामूली वृद्धि मुख्य रूप से इस्पात और सीमेंट क्षेत्रों में मजबूत वृद्धि का परिणाम थी। ये दोनों क्षेत्र कार्बन उत्सर्जन में अत्यधिक योगदान देते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत हैं। विश्लेषण में कहा गया है कि भारत में इस्पात उत्पादन में 8 प्रतिशत और सीमेंट उत्पादन में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

इसमें कहा गया है कि इस्पात और सीमेंट से होने वाले उत्सर्जन में वृद्धि बिजली क्षेत्र में देखी गई गिरावट से कहीं अधिक थी।

 

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