स्टांप ड्यूटी के अंतर पर आयकर का शिकंजा सख्त — खरीदार और विक्रेता दोनों पर पड़ सकता है दोहरा टैक्स बोझ
भोपाल में टैक्स लॉ बार एसोसिएशन की स्टडी सर्किल बैठक में विशेषज्ञों ने दी चेतावनी, 148A नोटिस के साथ नई धारा 281 के प्रावधान समझाए

विवेक झा, भोपाल, 17 अप्रैल 2026।
अचल संपत्ति के लेन-देन में स्टांप ड्यूटी मूल्य (SDV) और वास्तविक विक्रय मूल्य के बीच अंतर अब करदाताओं के लिए भारी पड़ सकता है। टैक्स लॉ बार एसोसिएशन, भोपाल द्वारा आयोजित मासिक स्टडी सर्किल में यह स्पष्ट किया गया कि ऐसे मामलों में आयकर विभाग अब खरीदार और विक्रेता—दोनों पर एक साथ कार्रवाई कर सकता है।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता सीए अमित जैन ने बताया कि यदि किसी संपत्ति का स्टांप ड्यूटी मूल्य, रजिस्ट्री में दर्शाए गए विक्रय मूल्य से अधिक है, तो विक्रेता पर आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 50C/43CA (नवीन अधिनियम की धारा 78/53) के तहत और खरीदार पर धारा 56(2)(x)/92(2)(x) के तहत टैक्स ऐडिशन लागू हो सकता है। इससे एक ही लेन-देन में दोनों पक्षों को अतिरिक्त कर देना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि अब आयकर विभाग के पास डेटा विश्लेषण की मजबूत व्यवस्था है। फॉर्म 26QB, SFT-12 रिपोर्टिंग और पंजीयन विभाग से मिलने वाली जानकारी के आधार पर विभाग पूरे ट्रांजेक्शन को ट्रैक कर सकता है। यही कारण है कि अब एक ही संपत्ति सौदे पर दोनों पक्षों के खिलाफ समानांतर पुनर्निर्धारण (Reassessment) की कार्रवाई शुरू की जा रही है।
148A नोटिस की प्रक्रिया समझाई
सत्र में आयकर अधिनियम की धारा 148A तथा नए अधिनियम की उत्तराधिकारी धारा 281 के तहत पुनर्निर्धारण प्रक्रिया का विस्तार से विश्लेषण किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि इस प्रक्रिया में कारण बताओ नोटिस देना, धारा 148A(d) के तहत “स्पीकिंग ऑर्डर” पारित करना, उच्च अधिकारी की पूर्व स्वीकृति और समय-सीमा का पालन अनिवार्य होता है।
छह बचाव उपाय बताए
विशेषज्ञों ने करदाताओं को ऐसे नोटिस से बचने और उनका जवाब देने के लिए छह महत्वपूर्ण उपाय सुझाए—
- 110% सेफ हार्बर नियम का उपयोग
- विभागीय वैल्यूएशन ऑफिसर (DVO) से मूल्यांकन करवाना
- एग्रीमेंट की तारीख के नियम का लाभ लेना
- “चेंज ऑफ ओपिनियन” का बचाव
- समय-सीमा और अनुमोदन में त्रुटियों पर आपत्ति
- अद्यतन आयकर रिटर्न (ITR-U) का रणनीतिक उपयोग
स्वैच्छिक प्रकटीकरण पर चेतावनी
सीए जैन ने चेतावनी दी कि यदि नोटिस मिलने के बाद अद्यतन विवरणी दाखिल की जाती है, तो सामान्य टैक्स दरों के अलावा 10% अतिरिक्त सरचार्ज भी देना पड़ता है। ऐसे में करदाताओं को यह निर्णय सोच-समझकर लेना चाहिए कि वे स्वैच्छिक प्रकटीकरण करें या कानूनी लड़ाई लड़ें।
नए और पुराने कानून का संक्रमण स्पष्ट
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि 1 अप्रैल 2026 तक लंबित सभी मामलों की कार्यवाही पुराने आयकर अधिनियम, 1961 के तहत ही जारी रहेगी, जबकि 2026-27 के बाद के मामलों में नया आयकर अधिनियम लागू होगा।
विशेषज्ञों और सदस्यों की मौजूदगी
इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष अधिवक्ता मनोज पारख, उपाध्यक्ष मयंक अग्रवाल एवं अंकुर अग्रवाल, सचिव धीरज अग्रवाल, सह सचिव संदीप चौहान सहित कई वरिष्ठ सदस्य राजेंद्र मनवानी, मृदुल आर्य, गोविंद वसंता, सीए राजेश जैन, सीए जितेंद्र जैन आदि और कर सलाहकार उपस्थित रहे।





